फीस को लेकर अभिभावकों का निजी स्कूल से मोह भंग

फीस को लेकर अभिभावकों का निजी स्कूल से मोह भंग

लखनऊ। कोरोना संक्रमण की वजह से स्कूलों को बंद कर दिया गया है। स्कूल बंद होने से बच्चों की पढ़ाई पर इसका सीधा असर हुआ है। एक तरफ जहां प्राइवेट स्कूलों में ऑनलाइन क्लास से बच्चे पढ़ रहे हैं, लेकिन इस पढ़ाई में टीचर से ज्यादा मां-बाप की भूमिका है, वहीं दूसरी ओर अभिभावक बच्चों की फीस को लेकर भी खासे परेशान है इसके लिए कभी वह शिक्षा विभाग से गुहार लगाते है तो कभी कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं। 6 जुलाई को हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ व हरियाणा के प्राइवेट स्कूलों को दो टूक कहा है कि जो छात्र निजी स्कूल छोड़कर सरकारी स्कूल में प्रवेश लेना चाहते हैं, उन्हें स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट देने में आनाकानी न करें। मामला चंडीगढ़ से स्कूलों की फीस व बैलेंस शीट से जुड़ा था जिसमें अब हरियाणा को भी प्रतिवादी बनाया गया है। चंडीगढ़ के स्कूलों को वेबसाइट पर बैलेंस शीट अपलोड करने व अभिभावकों से फीस की वसूली से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान यूटी प्रशासन ने बताया कि उन्होंने अपना जवाब सौंप दिया है लेकिन शिक्षा विभाग की बिल्डिंग कोरोना की वजह से सील होने के कारण यह रजिस्ट्री में दाखिल नहीं हो सका। यूटी प्रशासन ने इसके लिए समय देने की अपील की जिसे हाईकोर्ट ने मंजूर कर लिया।

इस दौरान अभिभावकों की ओर से दाखिल अर्जी पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अर्जी मंजूर करते हुए अभिभावकों को याचिका में पक्ष बना लिया है। हाईकोर्ट ने अभिभावकों से उनकी वित्तीय स्थिति को लेकर अगली सुनवाई पर हलफनामा सौंपने के भी आदेश दिए हैं। इसी दौरान हाईकोर्ट ने अब याचिका का दायरा और अधिक बढ़ाते हुए स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट को भी इसमें शामिल कर लिया है। हाईकोर्ट ने निजी स्कूलों को हिदायत दी कि वह ऐसे छात्रों को स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट देने में जरा भी आनाकानी ना करें जो खराब वित्तीय स्थिति के कारण प्राइवेट स्कूल छोड़कर सरकारी स्कूल में दाखिला लेना चाहते हैं।

कोविड-19 के कारण 65-70 दिन चले लॉकडाउन और अब अनलॉक-1 में जहां कई चीजों में छूट दे दी गई है वहीं अनलॉक-2 में अब भी स्कूल व कॉलेज बंद हैं। स्कूलों में संस्थागत पढ़ाई पर रोक है और जहां हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और दिल्ली सहित देश के अन्य कई राज्यों में सरकारी व निजी स्कूल पूरी तरह बंद हैं वहीं कई राज्यों के प्राइवेट स्कूल में छात्रों के लिए ऑनलाइन कक्षाएं चला रहे हैं। हालांकि प्राइवेट स्कूलों की ऑनलाइन कक्षाओं के नाम पर छोटे से लेकर बड़े प्राइवेट स्कूल अभिभावकों से ट्यूशन फीस के नाम पर अपै्रल, मई और जून की बढ़ी हुई फीस वसूली कर रहे हैं, तो वहीं निजी स्कूल के संचालकों ने कह दिया है कि अगर फीस जमा न की गई तो वो आंदोलन करेंगे।

निजी स्कूल संचालकों ने अभिभावकों से बच्चों की ट्यूशन फीस देने का आग्रह किया है। साथ ही सरकार से भी मांग की कि ऐसा आदेश जारी करें ताकि बच्चों की ट्यूशन फीस समय पर मिल सकें और स्कूल संचालकों के लगातार हो रहे खर्चे व टीचर की सैलरी सहित अन्य अदायगी की जा सके। सरकार निजी स्कूलों का सहयोग न करते हुए अभिभावकों को मासिक फीस जमा करवाने का स्पष्ट आदेश नहीं देती है तो सभी स्कूल मिलकर 10 जुलाई के बाद से बिना फीस जमा करवाने वाले बच्चों की ऑनलाइन क्लासें पूर्ण रूप से बंद कर देंगे तो वहीं अभिभावकों का कहना है कि लाॅकडाउन के कारण उनकी सैलरी में कटौती हुई जिसके कारण वो बढ़ी हुई या पूरी फीस नहीं दे सकते है। बार-बार निजी स्कूलों के दबाव के कारण कई अभिभावक तो अपने बच्चों को निजी स्कूलों से नाम कटवा कर सरकारी स्कूलों में दाखिल करवा रहे हैं।

जनवरी 2020 में जहां कई सरकारी स्कूलों में पर्याप्त बच्चे न होने के कारण स्कूलों को बंद करने की बात हो रही थी वहीं अब लोग अपने बच्चों का सरकारी स्कूलों में दखिला करा रहे हैं। इससे पहले 2019-20 के सेशन में 10 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को बंद किया जा चुका है। इतना ही नहीं हरियाणा के 231 स्कूलों को मर्ज भी किया जा चुका है। तो वहीं गुड़गांव के 5, फरीदाबाद के 10, करनाल 13, पंचकूला 22, अंबाला 9, यमुनानगर 16, कुरुक्षेत्र 10, पानीपत 7, कैथल 7, जींद 8, फतेहाबाद 9 समेत अन्य स्कूल पहले ही बंद हो चुके हैं। जनवरी 2020 में सरकारी स्कूलों में बच्चों की घटती संख्या से चिंतित शिक्षा निदेशालय ने नए विद्यार्थियों को जोड़ने के निर्देश दिए थे। विशेषकर विकट स्थिति उन 1062 स्कूलों की है जिन्हें विगत जनवरी में ही शिक्षा विभाग ने 25 बच्चों से कम होने के कारण बंद करने की कवायद शुरू कर दी थी। हालांकि तब शिक्षक संगठनों ने इन स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाने की बात कह कुछ महीनों की मोहलत मांग ली थी। अगर इन स्कूलों में बच्चों की संख्या नहीं बढ़ी तो इसी सत्र में इनके छात्रों को दूसरे स्कूलों में समायोजित किया जाना तय है लेकिन कोरोना संक्रमण के बाद लगता है कि सरकारी स्कूलों के दिन बहुरेंगे। निजी स्कूलों से चल रहे फीस विवाद के चलते और आर्थिक असमर्थता के चलते भी अभिभावकों अपने बच्चों को नाम सरकारी स्कूलों करवा रहे हैं। 6 जुलाई को चंडीगढ़ हाईकोर्ट निजी स्कूल टीसी देने में न-नुकुर न करें इससे भी सरकारी स्कूल रास्ता कुछ आसान हो गया है क्योंकि निजी स्कूलों से टीसी न मिल पाने के कारण कई अभिभावक मजबूर थे।

फिलहाल अभिभावकों को लुभाने के लिए खासकर अंग्रेजी मीडियम वाले सरकारी स्कूलों का सहारा लिया जा रहा है। साथ ही सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को मिलने वाली सुविधाएं गिनाई जा रही हैं। समय के साथ समाज का ट्रेंड बदल रहा है। जाहिर है अभिभावक भी बदल रहे हैं। हिंदी या अपनी मातृभाषा के स्थान पर अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई का क्रेज काफी अधिक है। हर कोई अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में ही पढ़ाना चाहता है। गरीब से गरीब आदमी भी चाहता है कि उनका बच्चा अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़े। कर्ज लेकर भी मां-बाप अपने बच्चे को पढ़ाना चाहते हैं। करियर के लिए भी अंग्रेजी जरूरी है। यही वजह है कि बच्चे और उनके अभिभावक अंग्रेजी की ओर आकर्षित हो रहे हैं। दिनों-दिन अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई की ओर पालकों व छात्रों का रुझान बढ़ता जा रहा है और इसकी वजह से अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों की बाढ़ सी आ गई है। इन स्कूलों में अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर लूट मची हुई है और इसका एहसास अभिभावकों अब हो रहा है। वहीं विकल्प के अभाव में पालक इन निजी स्कूलों की

मनमानी का विरोध भी नहीं कर पाते थे लेकिन अब परिस्थिति बदल गई है और अब यह मजबूरी बन गई है क्योंकि सरकारें भी निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगाने में असफल रही हैं।

(मोहिता स्वामी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)

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