जेसी बोस ने उपनिषद से जोड़ा विज्ञान

जेसी बोस ने उपनिषद से जोड़ा विज्ञान

नई दिल्ली। जगदीश चन्द्र बोस (जेसी बोस) पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो तरंगे डिटेक्ट करने के लिए सेमी कंडक्टर जंक्शन का इस्तेमाल किया था। बायोफिजिक्स के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने दिखाया पौधों में उत्तेजना का संचार वैद्युतिक (इलेक्ट्रिकल) माध्यम से होता है न कि केमिकल माध्यम से। बाद में इस दावे को वैज्ञानिक प्रयोगों से सच साबित किया गया। डॉ. जेसी बसु विश्लेषण करके इस नतीजे पर पहुंचे कि पौधे, संवेदनशील होते हैं, दर्द महसूस कर सकते हैं और स्नेह का अनुभव करते हैं अर्थात् पेड़-पौधों में भी जीवन होता है। उन्हें 1917 में नाइट की उपाधि प्रदान की गयी थी।

'ज्ञान किसी खास नस्ल की बपौती नहीं है... पूरी दुनिया एक-दूसरे पर आश्रित है और विचार की चिंरतन धारा मानवता को पोष रही है।' अपने इस कथन के अनुसार ही वैज्ञानिक और चिंतक जगदीश चंद्र बोस ने भारतीय ज्ञान परंपरा के अनूठे ग्रंथों वेदांतों और उपनिषदों का वैज्ञानिक पक्ष प्रस्तुत किया था. दुनिया में कुछ प्रतिभाएं ऐसी हुई हैं, जिन्होंने अपने समय से आगे की दृष्टि रखी और दुनिया को हैरान किया. मसलन, 1977 में सर नेविल मॉट ने कहा था कि 60 साल पहले ही बोस ने वो अनुमान लगाया था, जिस आविष्कार के लिए उन्हें नोबेल मिल रहा था।

वायरलेस टेलिग्राफी के लिए कैसे जी मार्कोनी को पेटेंट मिला, जबकि बोस ने मार्कोनी से दो साल पहले 1895 में ही यह आविष्कार किया था? या बोस की और वैज्ञानिक उपलब्धियां क्या रहीं? इन तमाम बातों से तो आप वाकिफ हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बोस ने उपनिषद और भौतिक शास्त्र को कैसे जोड़ा था? सिर्फ बोस ही क्यों! दुनिया भर के प्रसिद्ध और महान भौतिक शास्त्रियों के लिए उपनिषद किसी प्रयोगशाला से कम नहीं रहे. 1858 में जन्मे बोस गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता जैसी हस्तियों के समकालीन रहे थे और ये सभी बोस की प्रतिभा से प्रभावित थे।

जगदीश चंद्र बोस के वैज्ञानिक अध्ययनों, रिसर्चों और अन्य उपलब्धियों पर उपनिषदों का प्रभाव साफ तौर पर दिखता है। वास्तव में ब्राह्मण की जो परिकल्पना (जगत एक है, आत्मा एक है) उपनिषदों ने दी, उसे बोस ने वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध करने का प्रयास किया। इंग्लैंड में बोस के काम पर जब वैज्ञानिक विवाद हो रहे थे, तब टैगोर ने एक बंगाली पत्रिका में जो लिखा था, उस पर गौर किया जाना चाहिए। उपनिवेशवाद ने भारत के जिस आत्म गौरव को घायल किया है, उसे बहाल करने के लिए ही नहीं, बल्कि बोस को इसलिए भी सराहा जाना चाहिए क्योंकि वो उपनिषदों का सब कुछ एक ही है वाला ज्ञान आधुनिक विज्ञान के जरिये दुनिया को समझा रहे हैं। भले ही, ईसाई वैज्ञानिक यह कहते रहें कि जीवन या आस्था को समझाने वाला विज्ञान बेकार है, बोस के उपनिषद आधारित विज्ञान को खारिज नहीं किया जा सकता।

पौधों में जान होती है, पहली बार दुनिया को यह विज्ञान बताने वाले वैज्ञानिक और चिंतक जगदीश चंद्र बोस ने खुद 1918 में एक लेक्चर दिया था और उसमें उपनिषदों के बारे में विस्तार से चर्चा की थी. सी मैकेंजी ब्राउन ने बोस और वेदांत के संबंध में जो रिसर्च पेपर लिखा, उसके अनुसार बोस के लेक्चर का एक अंश इस तरह है:

प्राचीन चिंतक बहुत अच्छी तरह जानते थे कि जीवन और मन हर जगह सार रूप में है... जटिलता के अलावा, सारांश यह है कि पूर्ण विकास क्रमशः होता है. इस तरह का कीमती ज्ञान देने वाले पूर्वजों के वंशजों के तौर पर चिंतकों को यह स्वीकार करना चाहिए कि हर तरह की खोज जो विज्ञान कर रहा है, वह पूर्वजों का ज्ञान है, जिसका क्रमिक विकास हुआ है। बोस के उपनिषद आधारित विज्ञान की चर्चित किताब रिस्पॉंसेज इन द लिविंग एंड नॉन लिविंग की एडिटर सिस्टर निवेदिता रहीं इसलिए इस किताब की लेखन स्टाइल और प्रस्तुतिकरण पर उनका प्रभाव माना जाता है। निवेदिता और टैगोर के बीच हुए पत्र व्यवहार से भी पता चलता है कि निवेदिता ने वेदांतों और उपनिषदों के काफी अध्ययन के बाद बोस के काम को एडिट किया था।

डॉ. सर जगदीश चन्द्र बसु (30 नवंबर 1858-23 नवंबर, 1937) भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे जिन्हें भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान तथा पुरातत्व का गहरा ज्ञान था।

ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत में जन्मे बसु ने सेन्ट जैवियर महाविद्यालय, कलकत्ता से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। ये फिर लंदन विश्वविद्यालय में चिकित्सा की शिक्षा लेने गए, लेकिन स्वास्थ्य की समस्याओं के चलते इन्हें यह शिक्षा बीच में ही छोड़ कर भारत वापस आना पड़ा। इन्होंने फिर प्रेसिडेंसी महाविद्यालय में भौतिकी के प्राध्यापक का पद संभाला और जातिगत भेदभाव का सामना करते हुए भी बहुत से महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किये।

बसु का जन्म 30 नवम्बर 1858 को बंगाल (अब बांग्लादेश) में ढाका जिले के फरीदपुर के मेमनसिंह में हुआ था। उनके पिता भगवान चन्द्र बसु ब्रह्म समाज के नेता थे और फरीदपुर, बर्धमान एवं अन्य जगहों पर उप-मैजिस्ट्रेट या सहायक कमिश्नर थे। इनका परिवार रारीखाल गांव, बिक्रमपुर से आया था, जो आजकल बांग्लादेश के मुन्शीगंज जिले में है। ग्यारह वर्ष की आयु तक इन्होने गांव के ही एक विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। बसु की शिक्षा एक बांग्ला विद्यालय में प्रारंभ हुई। उनके पिता मानते थे कि अंग्रेजी सीखने से पहले अपनी मातृभाषा अच्छे से आनी चाहिए। विक्रमपुर में 1915 में एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए बसु ने कहा- उस समय पर बच्चों को अंग्रेजी विद्यालयों में भेजना हैसियत की निशानी माना जाता था। मैं जिस बांग्ला विद्यालय में भेजा गया वहाँ पर मेरे दायीं तरफ मेरे पिता के मुस्लिम परिचारक का बेटा बैठा करता था और मेरी बाईं ओर एक मछुआरे का बेटा। ये ही मेरे खेल के साथी भी थे। उनकी पक्षियों, जानवरों और जलजीवों की कहानियों को मैं कान लगा कर सुनता था। शायद इन्हीं कहानियों ने मेरे मस्तिष्क में प्रकृति की संरचना पर अनुसंधान करने की गहरी रुचि जगाई। विद्यालयी शिक्षा के बाद वे कलकत्ता आ गये और सेंट जेवियर स्कूल में प्रवेश लिया।

जगदीश चंद्र बोस की जीव विज्ञान में बहुत रुचि थी और 22 वर्ष की आयु में चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए। मगर स्वास्थ खराब रहने की वजह से इन्होने चिकित्सक (डॉक्टर) बनने का विचार त्यागकर कैम्ब्रिज के क्राइस्ट महाविद्यालय चले गये और वहाँ भौतिकी के एक विख्यात प्रो॰ फादर लाफोण्ट ने बोस को भौतिकशास्त्र के अध्ययन के लिए प्रेरित किया। वर्ष 1885 में ये स्वदेश लौटे तथा भौतिकी के सहायक प्राध्यापक के रूप में प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ाने लगे। यहां वह 1915 तक रहे। उस समय भारतीय शिक्षकों को अंग्रेज शिक्षकों की तुलना में एक तिहाई वेतन दिया जाता था। इसका जगदीश चंद्र बोस ने विरोध किया और बिना वेतन के तीन वर्षों तक काम करते रहे, जिसकी वजह से उनकी स्थिति खराब हो गई और उन पर काफी कर्जा हो गया था। इस कर्ज को चुकाने के लिये उन्हें अपनी पुश्तैनी जमीन भी बेचनी पड़ी। चैथे वर्ष जगदीश चंद्र बोस की जीत हुई और उन्हें पूरा वेतन दिया गया। बोस एक अच्छे शिक्षक भी थे, जो

कक्षा में पढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रदर्शनों का उपयोग करते थे। बोस के ही कुछ छात्र जैसे सतेन्द्र नाथ बोस आगे चलकर प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री बने। (हिफी)

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