आज ही के दिन 1972 में हुआ था शिमला समझौता

आज ही के दिन 1972 में हुआ था शिमला समझौता

आज ही कि दिन वर्ष 1972 में भारत-पाक युद्ध के बाद भारत के शिमला में भारत की तरफ से इंदिरा गांधी और पाकिस्तान की तरफ से जुल्फिकार अली भुट्टो ने एक संधि पर हस्ताक्षर किये थे, जिसे शिमला समझौता कहा जाता है। कई महीने तक चलने वाली राजनीतिक-स्तर की बातचीत के बाद जून 1972 के अंत में शिमला में भारत-पाकिस्तान शिखर बैठक हुई। इंदिरा गांधी और भुट्टो ने अपने उच्चस्तरीय मंत्रियों और अधिकारियों के साथ उन सभी विषयों पर चर्चा की जो 1971 के युद्ध से उत्पन्न हुए थे। साथ ही उन्होंने युद्ध बंदियों की अदला-बदली, पाकिस्तान द्वारा बांग्लादेश को मान्यता का प्रश्न, भारत और पाकिस्तान के राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाना, व्यापार फिर से शुरू करना और कश्मीर में नियंत्रण रेखा स्थापित करना। लम्बी बातचीत के बाद भुट्टो इस बात के लिए सहमत हुए कि भारत-पाकिस्तान संबंधों को केवल द्विपक्षीय बातचीत से तय किया जाएगा। शिमला समझौते के अंत में एक समझौते पर 2 जुलाई 1972 में इंदिरा गांधी और भुट्टो ने हस्ताक्षर किए थे।

इनमें यह प्रावधान किया गया कि दोनों देश अपने संघर्ष और विवाद समाप्त करने का प्रयास करेंगे और यह वचन दिया गया कि उप-महाद्वीप में स्थाई मित्रता के लिए कार्य किया जाएगा। इसके लिए तय किया कि दोनों देश सभी विवादों और समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान के लिए सीधी बातचीत करेंगे और किसी भी स्थिति में एकतरफा कार्यवाही करके कोई परिवर्तन नहीं करेंगे। वे एक दूसरे के विरूद्घ न तो बल प्रयोग करेंगे, न प्रादेशिक अखण्डता की अवेहलना करेंगे और न ही एक दूसरे की राजनीतिक स्वतंत्रता में कोई हस्तक्षेप करेंगे। दोनों ही सरकारें एक दूसरे देश के विरूद्ध प्रचार को रोकेंगी। दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाने के लिए रू सभी संचार संबंध फिर से स्थापित किए जाएंगे, आवागमन की सुविधाएं दी जाएंगी। दोनों देशों ने 17 सितम्बर 1971 की युद्ध विराम रेखा को नियंत्रण रेखा के रूप में मान्यता दी और यह तय हुआ कि इस समझौते के बीस दिन के अंदर सेनाएं अपनी-अपनी सीमा से पीछे चली जाएंगी। शिमला समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि दोनों देशों ने अपने विवादों को आपसी बातचीत से निपटाने का निर्णय किया। इसका यह अर्थ हुआ कि कश्मीर विवाद को अंतरराष्ट्रीय रूप न देकर, अन्य विवादों की तरह आपसी बातचीत से सुलझाया जाएगा।

शिमला समझौते के बाद 93 हजार पाकिस्तानी युद्धबंदियो को रिहा कर दिया गया। पाकिस्तान की जमीन भी वापस कर दी गई। दोनों देशों ने तय किया कि 17 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के बाद दोनों देशों की सेनाएं जिस स्थिति में थी उस रेखा को वास्तविक नियंत्रण रेखा माना जाएगा। दोनों ही देश इस रेखा को बदलने या उसका उल्लंघन करने की कोशिश नहीं करेंगे।

शिमला में शिखर वार्ता करने का चयन 23 अप्रैल 1972 को दूत स्तरीय वार्ता के दौरान किया गया था। इस शिखर वार्ता के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 27 जून को शिमला में पहुंच गई थी। तैयारियों और व्यवस्थाओं का जायजा स्वयं लिया था। इसके बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो 28 जून को अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो के साथ शिमला पहुंचे थे।

1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत कांग्रेस के लिए जैसे अलादीन का चिराग बन गयी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मौका भुनाने के लिए 14 राज्यों में चुनाव करवा दिए, जिसमें से 13 में उन्हें जीत मिली थी।

जून 1972 में इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो शिमला में मिले थे। उस समय डीपी धर, जो खुद कश्मीरी थे, चाहते थे कि इंदिरा कश्मीर मुद्दे पर बातचीत करें, लेकिन उन्होंने इस पर बात करना उचित नहीं समझा।

शिमला समझौते के लगभग डेढ़ सप्ताह बाद ही भुट्टो ने पाकिस्तान की संसद में कह दिया कि पाकिस्तान कश्मीर की अवाम के साथ है और अगर वहां आजादी के लिए आंदोलन होगा तो वह कश्मीरी जनता का साथ देगा।


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