आज के दिन ही शहीद हुए थे सिंध के वीर राजा दाहिर

आज के दिन ही शहीद हुए थे सिंध के वीर राजा दाहिर

आज राजा दाहिर का बलिदान दिवस है। बहुत से लोग शायद दाहिर सेन का नाम भी नही जानते होंगे। वह एक ऐसे राजा थे, जिनके बारे में इतिहासकार लिखते ही नहीं, वो चीजों को बड़ी ही मक्कारी से छिपाते हैं। दाहिर सेन सिन्धु राज्य के राजा थे, जिनका जन्म 663 ईसवी में हुआ था और 712 ईसवी में आज ही के दिन 20 जून को भूमि कि रक्षा करते हुए उन्होंने बलिदान दे दिया था। राजा दाहिर सिंध के सिंधी ब्राह्मण राजवंश के अंतिम राजा थे। उनके समय में ही अरबों ने सर्वप्रथम सन ७१२ में भारत (सिंध) पर आक्रमण किया था। मोहम्मद बिन कासिम मिशन 712 में सिंध पर आक्रमण किया था, जहां पर राजा दहिर ने उन्हें रोका और उनके साथ युद्ध लड़ा। उनका शासन काल 663 से 712 ईसवी तक रहा उन्होंने अपने शासनकाल में अपने सिंध प्रांत को बहुत ही मजबूत बनाया।

महाराजा दाहिर को उत्तराधिकार में कई विवाद मिले थे, जिनमें उनके पिता राजा चच के द्वारा लोहाणा, जाट और गुर्जर जाति के लोगों के अधिकारों को छीनकर उन्हें पदच्युत किया गया था, जिस कारण इस जाति के लोग शासन से नाराज थे। महाराजा दाहिर के चाचा द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने के कारण ब्राह्मण वर्ग नाराज था। इन सभी लोगों को साथ लेकर चलना और देश की रक्षा करना महाराजा दाहिर के लिए एक चुनौती थी। दाहिर ने शासन संभालते ही फिर सनातन हिंदू धर्म को राजधर्म घोषित कर ब्राह्मण समाज को अपने पक्ष में कर लिया। महाराजा दाहिर ने जबरन मजदूरी प्रथा को समाप्त कर दिया। महाराजा दाहिर ने यह व्यवस्था की कि यदि कोई एक साथ कर नहीं चुका सकता है, तो वह किश्तों में शासकीय कोष में जमा करा सकता है। इससे प्रजा में खुशी की लहर दौड़ गई। सिंध पर हुए 13 हमलों को उन्होंने नाकाम किया। महाराज दाहिर की दोनों बेटियों सूर्य कुमारी और परमाल ने गांव गांव में घूमकर सिंधियों को मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रेरित किया। जाटों, गुर्जरों और लोहाणों को फिर सेना में सम्मिलित कर उन्हें अधिकार देकर समाज में उनकी प्रतिष्ठा को स्थापित किया।

इतिहासकार बताते हैं कि मोहम्मद साहब की मौत के बाद सुन्नियों और शियाओं में इस बात को लेकर संघर्ष शुरू हो गया कि मोहम्मद के बाद मुसलमानों का नेता कौन होगा। मोहम्मद के कई परिजनों को सिंधुपति दाहिर सेन ने बचाकर उन्हें अपने सिन्धु देश में शरण दी थी। भारत को लूटने और इस पर कब्जा करने के लिए पश्चिम के रेगिस्तानों से आने वाले मजहबी हमलावरों का वार सबसे पहले सिन्ध कि वीरभूमि को ही झेलना पड़ता था। इसी सिन्ध के राजा दाहरसेन ने युद्धभूमि में लड़ते हुए प्राणाहुति दी। उनके बाद उनकी पत्नी, बहन और दोनों पुत्रियों ने भी अपना बलिदान देकर भारत में एक नयी परम्परा का सूत्रपात किया ।

''जडहिं कडहि सिन्धुड़ी तोखे कंधारां जोखो''

सिंध के मामोई फकीरों के इस कथन का अर्थ है, हे सिंध भूमि तुम्हें कंधार की ओर से ही खतरा है। भारत का पश्चिमी सीमा प्रांत सिंध पर प्रारंभ से ही विदेशी आक्रांताओं के हमलों का शिकार रहा है। भारत भूमि पर बुरी नजर रखने वाले ईरानी, ईराकी, यवन, कंधार के रास्ते सिंध के रास्ते भारत भूमि में प्रवेश करने का कुत्सित प्रयास करते रहे हैं।

राजा दाहरसेन एक प्रजावत्सल राजा थे। गौरक्षक के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। ईरान के शासक हज्जाम ने 712 ई. में अपने सेनापति मोहम्मद बिन कासिम को एक विशाल सेना देकर सिन्ध पर हमला करने के लिए भेजा। कासिम ने देवल के किले पर कई आक्रमण किये पर राजा दाहरसेन और हिन्दू वीरों ने हर बार उसे पीछे धकेल दिया। सीधी लड़ाई में बार-बार हारने पर कासिम ने धोखा किया। 20 जून 712 ई. को उसने सैकड़ों सैनिकों को हिन्दू महिलाओं जैसा वेश पहना दिया। लड़ाई छिड़ने पर वे महिला वेशधारी सैनिक रोते हुए राजा दाहरसेन के सामने आकर मुस्लिम सैनिकों से उन्हें बचाने की प्रार्थना करने लगे। राजा ने उन्हें अपनी सैनिक टोली के बीच सुरक्षित स्थान पर भेज दिया और शेष महिलाओं कि रक्षा के लिए तेजी से उस ओर बढ़ गये जहां से रोने के स्वर आ रहे थे। इस दौड़भाग में वे अकेले पड़ गये। उनके हाथी पर अग्निबाण चलाये गये जिससे विचलित होकर वह खाई में गिर गया। यह देखकर शत्रुओं ने राजा को चारों ओर से घेर लिया। राजा ने बहुत देर तक संघर्ष किया पर अंततः शत्रु सैनिकों के भालों से उनका शरीर क्षत-विक्षत होकर मातृभूमि की गोद में सदा के लिये सो गया। इधर महिला वेश में छिपे मुस्लिम सैनिकों ने भी असली रूप में आकर हिन्दू सेना पर बीच से हमला कर दिया। इस प्रकार हिन्दू वीर दोनों ओर से घिर गये और मोहम्मद बिन कासिम का पलड़ा भारी हो गया।

राजा दाहरसेन के बलिदान के बाद उनकी पत्नी लाड़ी और बहन पद्मा ने भी युद्ध में वीरगति पाई। कासिम ने राजा का कटा सिर, छत्र और उनकी दोनों पुत्रियों सूर्या और परमाल को बगदाद के खलीफा के पास उपहार स्वरूप भेज दिया। जब खलीफा ने उन वीरांगनाओं का आलिंगन करना चाहा तो उन्होंने रोते हुए कहा कि कासिम ने उन्हें अपवित्र कर आपके पास भेजा है।

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