महाराष्ट्र: आत्म गौरव व राष्ट्र गौरव में संघर्ष

महाराष्ट्र: आत्म गौरव व राष्ट्र गौरव में संघर्ष

कभी-कभी परिस्थितियां बड़ी जटिल हो जाती हैं। महाराष्ट्र के पुणे में भीमा कोरेगांव में भी ऐसे ही हालात हिंसा के रूप में परिणित हो गये। वहां के महार जाति के लोग आत्मगौरव को राष्ट्र गौरव से बड़ा मान रहे हैं। आत्म गौरव का महत्व भी कम नहीं होता, चाहे वो व्यक्तिगत हो अथवा जातिगत लेकिन उसे राष्ट्र गौरव से बड़ा नहीं होना चाहिए। इस बात को किसी कानून के भय से नहीं बल्कि सामाजिक सद्भाव से सुलझाना चाहिए। दुर्भाग्य से देश की आजादी के बाद इस प्रकार की बातों पर ध्यान ही नहीं दिया गया। देश के सामने निश्चित रूप से ऐसी समस्याएं थीं जिनका प्राथमिकता के आधार पर समाधान होना था। ब्रिटिश हुकूमत ने देश के दो टुकड़े ही नहीं कर दिये थे बल्कि पूरी तरह कंगाल कर दिया था। इसलिए रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत समस्याओं से हम जूझ ही रहे थे, उसी समय चीन ने हमला कर दिया। हमारे सैनिकों ने सन् 62 की लड़ाई हथियारों से नहीं हौंसलों से लड़ी थी। इसके बाद हमने हर क्षेत्र में तरक्की की और आज विकसित देशों को पंक्ति में खड़े होने वाले हैं। लेकिन इस बीच कई चीजें पीछे छूट गयी हैं। उन पर भी अब ध्यान देने की जरूरत है। यह काम बहुत सावधानी से करना है। यदि सावधानी नहीं बरती तो पुणे जैसी दुखद घटनाएं होती रहेंगी।
हमारा इतिहास बहुत बड़ा है लेकिन उसका शुरुआती छोर सभी को नहीं पकड़ाया जा सकता। आज यहां जो रह रहे हैं, सभी हमारे देश के हैं लेकिन उनके पूर्वजों को हम तलाशने लगेंगे तो वे बेगाने नजर आएंगे और उन पूर्वजों के पूर्वजों को तलाश करें तो वे फिर अपने हो जाएंगे। सभी को जब देश को आजादी मिली उसके बाद हम अपने देश के बारे में सोचेंगे तो हमारी जटिलताएं अपने आप कम हो जाएंगी। ऐसा न सोच करके ही हम अनावश्यक विवाद उत्पन्न करते रहते हैं। मामला चाहे बाबरी मस्जिद का हो, ताजमहल का हो अथवा महाराष्ट्र के पुणे मंे महार जाति के गौरव-जश्न का। इन सभी का समाधान देश की आजादी के बाद की सोच पर ही हो सकता है। हो सकता है कुछ लोग मुझसे सहमत न हों कि बाबरी मस्जिद को हमने आजादी के बाद जैसा पाया था, यदि उसे वेसे ही बनाए रखते तो कितनी ही दुखद घटनाओं से हम बच सकते थे। हिन्दुओं को पूजा-पाठ करने का पूरा अधिकार था और रामलला को भी पक्की छत मिली थी। उन्हें फटे-पुराने तिरपाल में तो नहीं रहना पड़ता। इसी तरह ताजमहल को किसने बनवाया, इस पचड़े में पड़ने की क्या जरूरत है। आज दुनिया का सातवां आश्चर्य हमारे पास है और पर्यटकों से लाखों की धनराशि कमा कर हमें देता है।
महाराष्ट्र के पुणे में सन् 1818 में ब्रिटिश सेना और पेशवाओं के बीच युद्ध हुआ था। अंग्रेजों ने कई रियासतों के साथ युद्ध किये और एक-दूसरे को लड़ाकर अपना साम्राज्य बनाया था। भीमा कोरेगांव युद्ध में अंगे्रज सेना में पांच सौ सैनिक महार जाति के थे। इतिहास में बताया गया है कि एक जनवरी 1818 को भीमा कोरे गांव में अंग्रेजों की सेना ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को पराजित कर दिया था जबकि पेशवा के पास 28 हजार सैनिक थे। उसी समय से दलित समुदाय इस युद्ध को ब्राह्मणवादी सत्ता के खिलाफ जंग में अपनी विजय मानता आ रहा है। अंग्रेजों की कूटनीति तो जगजाहिर है। हुआ यह था कि 5 नवम्बर 1817 को खडकी और यरवदा की हार के बाद पेशवा बाजीराव द्वितीय ने पुलगांव में डेरा डाला था। उनके साथ प्रताप सिंह छत्रपति और उनकी 28 हजार सेना थी जिसमे अरब सहित कई जातियों के सैनिक थे। दिसम्बर 1817 में सूचना मिली कि ब्रिटिश सेना शिरूर से पुणे पर हमला करने वाली है, इसलिए छत्रपति प्रताप सिंह ने उसे रोकने का फैसला किया। लगभग 800 सैनिकों की ब्रिटिश सेना भीमा नदी के किनारे कोरेगांव पहुंची। इनमे पांच सौ महार जाति के सैनिक थे। अंग्रेज सेनापति जानता था कि दलितों को ब्राह्मणवादी सत्ता से नफरत है, इसलिए महार सैनिकों को आगे कर दिया गया। महार सैनिकों ने अपनी पूरी ताकत लगा दी और पेशवा सेना को हरा दिया।
कोरेगांव-भीमा युद्ध की 200वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर 31 दिसम्बर 2017 को एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसको लेकर सवर्ण समुदाय को नाराजगी थी। हिन्दू एकता अगड़ी के नेता मिलिंद एकबोटे और शिवराज प्रतिष्ठान के संभा जी भिड़े ने इस आयोजन को लेकर कड़ा विरोध जताया। इस कार्यक्रम में दलितों को एकत्रित करने की भी राजनीति की गयी। गुजरात से दलित नेता जिग्नेश मेवानी भी वहां पहुंच गये थे। जिग्नेश के अलावा बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के पोते प्रकाश अम्बेडकर, जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने में चर्चित हुए छात्र नेता उमर खालिद, हैदराबाद यूनिवर्सिटी में आत्महत्या करके चर्चित हुए रोहित बेमुला की मां राधिका बेमुला भी मौजूद थीं। इस प्रकार भीमा कोरेगांव युद्ध की वर्षगांठ मनाने के समर्थन और विरोध में पूरी तैयारी हो गयी थी लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने इस पर उचित ध्यान नहीं दिया। कार्यक्रम के दौरान हिंसा हुई जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गयी और इसके बाद महाराष्ट्र के 16 शहर जल उठे। अब इस पर राजनीति हो रही है। इसे दलित उत्पीड़न से जोड़ दिया गया है। तीन दिसम्बर को इस मामले को लेकर संसद में भी घमासान हुआ। विपक्षी दलों ने महाराष्ट्र सरकार की विफलता करार दिया तो सत्तारूढ़ भाजपा ने कांग्रेस पर भावनाएं भड़काने और इस मामले पर राजनीति करने का आरोप लगाया।
कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे कहते हैं कि देश में कुछ शक्तियां दलितों पर अत्याचार करती है। दलित जब स्वाभिमान के साथ जीना चाहते हैं और कोई कार्यक्रम करते हैं तो कुछ लोग उसमें दखल देकर उसका फायदा उठाना चाहते हैं। दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने गुजरात विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस का साथ दिया था, इसलिए कांग्रेस इसे दलितों के आत्मसम्मान का मामला बता रही है। किसी के भी आत्म सममान का समर्थन ही किया जाना चाहिए लेकिन 1818 के एक मामले को लेकर इसे देश के सम्मान से भी जोड़ा जाना चाहिए। देश जब आजाद कराया जा रहा था, तब महात्मा गांधी के साथ बड़ी संख्या में दलित भी शामिल थे। देश को आजाद कराने में दलितों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दलित वर्ग की ही ऊदा देवी ने अंग्रेजों से लड़ते हुए लखनऊ में अपनी जिंदगी अर्पित कर दी थी और आज भी उनकी मूर्ति उस स्थान पर लगी है जहां वे शहीद हुई थीं। इस प्रकार कितने ही दलित देश की खातिर कुर्बान हुए। अंग्रेजों से उनको कोई लगाव नहीं था बल्कि इस देश से था। यह लगाव अब भी है। बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर को हम कैसे भुला सकते हैं। बाबू जगजीवन राम जैसे लोकप्रिय नेता दलित वर्ग के ही रहे हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती दलित नेता हैं और तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही हैं। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद राष्ट्रपति के पद पर श्री रामनाथ कोविंद आसीन हैं जो दलित हैं। इस तरह दलितों ने इस देश के लिए अपना महान योगदान दिया तो देश ने भी उन्हें सम्मान देने में कोई भेदभाव नहीं किया है।
यह बात महाराष्ट्र में पुणे के उन महारों को भी समझायी जा सकती है कि उनके आत्मगौरव पर इस देश को गर्व है, उनकी बहादुरी को सभी सलाम करते हैं लेकिन जो बात देश के गौरव को धुंधला करती हो, उसे भूल जाना ही बेहतर होता है। अंग्रेजों और दूसरे विदेशी आक्रांताओं के साथ इस देश के लोग कर्तव्यनिष्ठ होकर लड़े तो यह भारतीय परम्परा है। महाभारत के युद्ध में पाण्डवों के रिश्तेदार कौरव सेना में बहादुरी के साथ लड़ रहे थे लेकिन क्या आज उनके वंशज उनकी शौर्य गाथा को याद करके जश्न मनाएं? ऐसा करके हम विघटन और वैमनस्यता को ही बढ़ा सकते हैं। इसलिए हमने कहा कि अब सन् 1947 के बाद के इतिहास को प्राथमिकता देनी होगी। उसके पूर्व का इतिहास हमें कई उलझनों में डाल सकता है जैसा कि महाराष्ट्र के पुणे में हुआ है।

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